केले का भोज Part – 1


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यह एक ऐसी घटना है जिसकी याद दस साल बाद भी मुझे शर्म से पानी पानी कर देती है। लगता है धरती फट जाए और उसमें समा जाऊँ। अकेले में भी आइना देखने की हिम्मत नहीं होती।

कोई सोच भी नहीं सकता किसी के साथ ऐसा भी घट सकता है !!! एक छोटा सा केला।

उस घटना के बाद मैंने पापा से जिद करके जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली) ही छोड़ दिया। पता नहीं मेरी कितनी बदनामी हुई होगी। दस साल बाद आज भी किसी जेएनयू के विद्यार्थी के बारे में बात करते डर लगता है। कहीं वह सन 2000 के बैच का न निकले और सोशियोलॉजी विषय का न रहा हो। तब तो उसे जरूर मालूम होगा। खासकर हॉस्टल का रहनेवाला हो तब तो जरूर पहचान जाएगा।

गनीमत थी कि पापा को पता नहीं चला। उन्हें आश्चर्य ही होता रहा कि मैंने इतनी मेहनत से जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय, दिल्ली ) की प्रवेश परीक्षा पासकर उसमें छह महीने पढ़ लेने के बाद उसे छोड़ने का फैसला क्यों कर लिया। मुझे कुछ सूझा नहीं था, मैंने पिताजी से बहाना बना दिया कि मेरा मन सोशियोलॉजी पढ़ने का नहीं कर रहा और मैं मास कम्यूनिकेशन पढ़ना चाहती हूँ। छह महीने गुजर जाने के बाद अब नया एडमिशन तो अगले साल ही सम्भव था। चाहती थी अब वहाँ जाना ही न पड़े। संयोग से मेरी किस्मत ने साथ दिया और अगले साल मुझे बर्कले यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में छात्रवृत्ति मिल गई और मैं अमेरिका चली गई।

लेकिन विडम्बना ने मेरा पीछा वहाँ भी नहीं छोड़ा। यह छात्रवृत्ति नेहा को भी मिली थी और वह अमरीका मेरे साथ गई। वही इस कारनामे की जड़ थी। उसी ने जेएनयू में मेरी यह दुर्गति कराई थी। उसने अपने साथ मुझसे भी छात्रवृत्ति के लिए प्रार्थनापत्र भिजवाया था और पापा ने भी उसका साथ होने के कारण मुझे अकेले अमेरिका जाने की इजाजत दी थी। लेकिन नेहा की संगत ने मुझे अमेरिका में भी बेहद शर्मनाक वाकये में फँसाया, हालाँकि बाद में उसका मुझे फायदा मिला था। पर वह एक दूसरी कहानी है। नेहा एक साथ मेरी जिन्दगी में बहुत बड़ा दुर्भाग्य और बहुत बड़ा सौभाग्य दोनों थी।

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वो नेहा ! जेएनयू के साबरमती हॉस्टल की लड़कियाँ की सरताज। जितनी सुंदर उससे बढ़कर तेजस्वी, बिल्लौरी आँखों में काजल की धार और बातों में प्रबुद्ध तर्क की धार, गोरापन लिये हुए छरहरा शरीर, किंचित ऊँची नासिका में चमकती हीरे की लौंग, चेहरे पर आत्मविश्वारस की चमक, बुध्दिमान और बेशर्म, न चेहरे, न चाल में संकोच या लाज की छाया, छातियाँ जैसे मांसलता की अपेक्षा गर्व से ही उठी रहतीं, उच्चवर्गीय खुले माहौल से आई तितली।

अन्य हॉस्टलों में भी उसके जैसी विलक्षण शायद ही कोई दिखी। मेरी रूममेट बनकर उसे जैसे एक टास्क मिल गया था कि किस तरह मेरी संकोची, शर्मीले स्वभाव को बदल डाले। मेरे पीछे पड़ी रहती। मुझे दकियानूसी बताकर मेरा मजाक उड़ाती रहती। उसकी तुर्शी-तेजी और पढ़ाई में असाधारण होने के कारण मेरे मन पर उसका हल्का आतंक भी रहता, हालाँकि मैं उससे अधिक सुंदर थी, उससे अधिक गोरी और मांसल लेकिन फालतू चर्बी से दूर, फिगर को लेकर मैं भी बड़ी सचेत थी, उसके साथ चलती तो लड़कों की नजर उससे ज्यादा मुझ पर गिरती, लेकिन उसका खुलापन बाजी मार ले जाता। मैं उसकी बातों का विरोध करती और एक शालीनता और सौम्यता के पर्दे के पीछे छिपकर अपना बचाव भी करती। जेएनयू का खुला माहौल भी उसकी बातों को बल प्रदान करता था। यहाँ लड़के लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं था, दोनों बेहिचक मिलते थे। जो लड़कियाँ आरंभ में संकोची रही हों वे भी जल्दी जल्दी नए माहौल में ढल रही थीं। ऐसा नहीं कि मैं किसी पिछड़े माहौल से आई थी। मेरे पिता भी अफसर थे, तरक्कीपसंद नजरिये के थे और मैं खुद भी लड़के लड़कियों की दोस्ती के विरोध में नहीं थी। मगर मैं दोस्ती से सेक्स को दूर ही रखने की हिमायती थी

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जबकि नेहा ऐसी किसी बंदिश का विरोध करती थी। वह कहती शादी एक कमिटमेंट जरूर है मगर शादी के बाद ही, पहले नहीं। हम कुँआरी हैं, लड़कों के साथ दोस्ती को बढ़ते हुए अंतरंग होने की इच्छा स्वाभाविक है और अंतरंगता की चरम अभिव्यक्ति तो सेक्स में ही होती है। वह शरीर के सुख को काफी महत्व देती और उस पर खुलकर बात भी करती। मैं भारतीय संस्कृति की आड़ लेकर उसकी इन बातों का विरोध करती तो वह मदनोत्सव, कौमुदी महोत्सव और जाने कहाँ कहाँ से इतिहास से तर्क लाकर साबित कर देती कि सेक्स को लेकर प्रतिबन्ध हमारे प्राचीन समाज में था ही नहीं। मुझे चुप रहना पड़ता।

पर बातें चाहे जितनी कर खारिज दो मन में उत्सुकता तो जगाती ही हैं। वह औरतों के हस्तमैथुन, समलैंगिक संबंध के बारे में बात करती। शायद मुझसे ऐसा संबंध चाहती भी थी। मैं समझ रही थी, मगर ऊपर से बेरुखी दिखाती। मुझसे पूछती कभी तुमने खुद से किया है, तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होती! भगवान ने जो खूबियाँ दी हैं उनको नकारते रहना क्या इसका सही मान है? जैसे पढ़ाई में अच्छा होना तुम्हारा गुण है, वैसे ही तुम्हारे शरीर का भी अच्छा होना क्या तुम्हारा गुण नहीं है? अगर उसकी इज्जत करना तुम्हें पसंद है तो तुम्हारे शरीर ……

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